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जम्मू-कश्मीर में क्रिकेटर ने हेलमेट पर लगाया फिलिस्तीनी झंडा:घरेलू लीग मैच खेल रहा था; पुलिस ने खिलाड़ी-आयोजक को पूछताछ के लिए बुलाया

जम्मू-कश्मीर में एक घरेलू लीग मैच के दौरान एक क्रिकेटर के फिलिस्तीनी झंडे के इस्तेमाल पर विवाद खड़ा हो गया है। क्रिकेटर का नाम फुरकान भट्ट है। वह बुधवार को जम्मू और कश्मीर चैंपियंस लीग में मैच खेल रहे थे। लोकल टीम JK11 की तरफ से मैदान में बैटिंग करने आए फुरहान ने हेलमेट पर फिलिस्तीनी झंडा लगा लिया। मामला सामने आने के बाद जम्मू ग्रामीण पुलिस ने खिलाड़ी को पूछताछ के लिए बुलाया है। इसके अलावा, लीग के आयोजक जाहिद भट्ट से भी पूछताछ की जाएगी। दरअसल इजराइल-हमास के बीच 2023 से जंग चल रही है। सबसे ज्यादा असर फिलिस्तीन के गाजा पर पड़ा है। जिस पर हमास का शासन है। अब तक 67 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, इनमें 18,430 बच्चे (लगभग 31%) शामिल हैं। जिस मैच पर विवाद, उसकी 2 तस्वीरें… जंग के 2 साल बीते, खंडहर हुआ गाजा हमास के हमले से शुरू हुए गाजा युद्ध के दो साल से ज्यादा हो गए हैं। 7 अक्टूबर 2023 को हमास ने इजराइल में घुसपैठ की और करीब 251 लोगों को बंधक बना लिया। जवाब में इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तुरंत जंग का ऐलान किया और हमास पर हमले शुरू कर दिए। इन दो सालों में गाजा की 98% खेती की जमीन बंजर हो गई है। अब सिर्फ 232 हेक्टेयर जमीन ही उपजाऊ बची है। यहां फिर से खेती शुरू करने में 25 साल लगेंगे। जंग की वजह से गाजा के 23 लाख लोगों में से 90% बेघर हो गए हैं। ये बिना पानी-बिजली के तंबुओं में रह रहे हैं और आधे से ज्यादा भुखमरी झेल रहे हैं। 80% इलाका मिलिट्री जोन बन चुका है। UN की रिपोर्ट के मुताबिक, गाजा में जमा 510 लाख टन मलबा हटाने में 10 साल और 1.2 ट्रिलियन डॉलर लग सकते हैं। 80% इमारतें तबाह हो गई हैं, जिससे 4.5 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है। 66 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे गए उत्तर और दक्षिण गाजा से भगाए गए लाखों लोग अब टेंटों में बिना पानी, बिजली और दवा के दिन गुजार रहे हैं। यूएन एजेंसियों के मुताबिक, आधे से ज्यादा लोग भुखमरी से जूझ रहे हैं। अब तक 67 हजार से ज्यादा फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, इनमें 18,430 बच्चे (लगभग 31%) शामिल हैं। गाजा में करीब 39,384 बच्चे सूचि बद्ध हैं जिनके माता या पिता में से कोई एक मारा गया है। वहीं, 17,000 फिलिस्तीनी बच्चे माता-पिता दोनों खो चुके हैं। राहत एजेंसियां कहती हैं- यह अब शहर नहीं, जिंदा बचे लोगों का कैंप मात्र है।


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