किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) लखनऊ के नेत्र रोग विभाग में किए गए शोध ने आंख के कैंसर रेटिनोब्लास्टोमा।से पीड़ित छोटे बच्चों के लिए नई उम्मीद जगी है। शोधकर्ताओं ने 3D प्रिंटिंग तकनीक की मदद से कस्टमाइज्ड PLA इम्प्लांट तैयार किया है। यह इम्प्लांट उन बच्चों के लिए है, जिनकी आंख निकालनी पड़ी थी। इससे न सिर्फ चेहरा पहले जैसा सुंदर दिखेगा, बल्कि इलाज भी बहुत सस्ता और सुरक्षित हो जाएगा। सिर्फ 10 रुपए की लागत से होगा काम शोध में 3D प्रिंटेड इम्प्लांट पूरी तरह सुरक्षित पाया गया। इसे पारंपरिक इम्प्लांट की तुलना में बहुत बेहतर फिटिंग होती है। साथ ही जटिलताओं का खतरा काफी कम हो जाता है। इससे सिर्फ 10 रुपए से भी कम की लागत में काम हो जाएगा। जबकि यह बाजार में उपलब्ध सामान्य इम्प्लांट 1,500 से 2,500 रुपये तक के मिलते हैं। शोधार्थी KGMU नेत्र रोग विभाग की एमएस छात्रा डॉ. शिवानी सुरेश ने यह शोध किया है। इनके मार्गदर्शक प्रो. संजीव कुमार गुप्ता हैं।सह-मार्गदर्शक डॉ. अरुण कुमार शर्मा, प्रो. सिद्धार्थ अग्रवाल और डॉ. विशाल कटियार सहित अन्य लोग हैं। विभागाध्यक्ष प्रो अपजित कौर ने बताया कि जब किसी बच्चे या व्यक्ति की आंख ट्रॉमा या कैंसर की वजह से निकालनी पड़ती है, तो आंख की जगह (सॉकेट) में खालीपन रह जाता है। ऐसे में लगाई जाने वाली कृत्रिम आंख ठीक से नहीं बैठ पाती और चेहरा बेडौल दिखता है। उन्होंने बताया कि आंख की हड्डी वाली जगह (ऑर्बिट) में एक ऑर्बिटल इम्प्लांट लगाया जाता है। यह इम्प्लांट कृत्रिम आंख को अच्छे से सपोर्ट देता है और चेहरा स्वाभाविक व सुंदर बनाता है। पहले ये इम्प्लांट ऐक्रेलिक प्लास्टिक या सिलिकॉन से बनाए जाते थे, जो महंगे पड़ते थे। अब KGMU के शोधकर्ताओं ने 3D प्रिंटिंग से PLA मटेरियल का इस्तेमाल कर बहुत सस्ता और बेहतर इम्प्लांट बनाने का तरीका निकाला है।

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