आचार्य नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय ने किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से अंजीर की खेती का प्रयोग शुरू किया है। विश्वविद्यालय प्रशासन इसके लिए एक मॉडल विकसित कर रहा है, जिसके माध्यम से किसानों को अंजीर की खेती के लिए प्रेरित किया जाएगा। यह प्रयोग उद्यान महाविद्यालय के एक बीघा क्षेत्रफल में पहली बार किया जा रहा है। अंजीर की खेती से किसान अधिक लाभ कमा सकते हैं, क्योंकि इसे अनुपयोगी भूमि पर भी उगाया जा सकता है। ठंड के मौसम में अंजीर की मांग बढ़ जाती है। यह फाइबर, पोटेशियम, कैल्शियम, आयरन, एंटी-ऑक्सीडेंट और अन्य पोषक तत्वों से भरपूर होता है। सर्दियों में इसका सेवन पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है, रक्त संचार बढ़ाता है, रक्त शर्करा को नियंत्रित करता है और ऊर्जा प्रदान करता है। पहले चरण में विश्वविद्यालय के आसपास के किसानों को इसका प्रशिक्षण दिया जाएगा। विश्वविद्यालय के उद्यान विभाग के कृषि विज्ञानी डॉ. कुलदीप पाण्डेय ने बताया कि अंजीर की कई प्रजातियां हैं, लेकिन पूना, ब्राउन, टर्की और दिनकर जैसी अधिक लाभदायक प्रजातियां प्रमुख हैं। विश्वविद्यालय इन्हीं प्रजातियों की मॉडल खेती करेगा और किसानों को इनके उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करेगा। इसका उद्देश्य पूर्वांचल क्षेत्र में अंजीर की खेती को बढ़ावा देना है। वर्तमान में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर, लखनऊ, सोनभद्र, हमीरपुर और प्रयागराज में इसकी खेती होती है। अंजीर की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी (पीएच 6-8) और शुष्क जलवायु उपयुक्त होती है। दिसंबर-जनवरी या मानसून का समय इसके रोपण के लिए सर्वोत्तम है। अंजीर की कलम तैयार कर उचित दूरी पर लगाई जाती है। इसके लिए समय पर गड्ढे खोदना, खाद-मिट्टी भरना और सिंचाई करना आवश्यक है। खरपतवार नियंत्रण के लिए निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। अंजीर के साथ अन्य फसलें भी ली जा सकती हैं। इसके फल लगभग 45-50 दिनों में पक जाते हैं, जिससे किसानों को अच्छा मुनाफा होता है। डॉ. कुलदीप पांडेय ने यह भी बताया कि आगामी किसान मेले में किसानों को अंजीर प्रक्षेत्र का भ्रमण कराया जाएगा।

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