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UPPCS में सफलता के बाद मंदिर में फूट-फूटकर रोए आनंद:पिता किसान हैं, कठिन सफर में भाई का एक्सीडेंट, अब बने नायाब तहसीलदार

सोनभद्र के रहने वाले आनंद राज नायब तहसीलदार बन गए हैं। रविवार को UPPCS का रिजल्ट आने के बाद वह सोमवार को प्रयागराज के हनुमान मंदिर पहुंचे। यहां मंदिर में माथा टेका। इस दौरान उनकी आंखों से आंसू बह निकले। वह रोने लगे। मंदिर के पुजारी ने उन्हें चुप कराया। सफलता पर बधाई दी। आनंद ने बताया कि मेरे पिता किसान हैं। साथ ही एक छोटी कंपनी में कर्मचारी के रूप में काम करते हैं। घर की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है। इसलिए यह सफर मेरे लिए और भी चुनौतीपूर्ण रहा। मैं प्रयागराज में रहकर पढ़ाई करता हूं। मेरा बड़ा भाई घर की सारी जिम्मेदारियां संभालता था। मगर तीन साल पहले एक एक्सीडेंट में मेरे भाई की मौत हो गई। वह मेरे जीवन का सबसे कठिन दौर था। उन्होंने कैसे तैयारी की? परिवार और दोस्तों का सपोर्ट कैसा रहा? तैयारी के दौरान उन्हें कौन-कौन सी दिक्कतों का सामना करना पड़ा? दैनिक भास्कर ने आनंद से बात की। पढ़िए रिपोर्ट… सवाल: आप नयाब तहसीलदार बन गए हैं,सबसे पहले कैसी कैसा महसूस कर रहे हैं आप? जवाब: जो मेरा पहला भाव था इस परीक्षा को उत्तीर्ण करने का वह बस एक भाव था कि ग्रेटट्यूड हंबल्ड मतलब जैसे एक कर्ता का भाव जो होता है वह मेरे अंदर से जा चुका है पूरी तरीके से मैं खुशी बहुत ज्यादा है पर उसके साथ एक विनम्रता का भाव आ रहा है मेरे साथ जैसा कि आपने कहा कि कर्तव्य कर्तव्य के भावने से आपका कर्तव्य था आपने किया आपको सफलता भी प्राप्त हुई सवाल: क्या कठिनाइयां आईं कभी? जवाब: यह लंबी जर्नी थी। 2009 में मैं कक्षा 5 में पढ़ता था। तब मुझे मेरे यहां के DM ने एक प्रतियोगिता में सम्मानित किया था। तभी मुझे सिविल सेवा का आइडिया आया। 12वीं में मेरे 90% थे। मेरे सामने फाइनेंसियल क्राइसिस थी। मैं अच्छे कॉलेज में नहीं पढ़ पाया। बीएचयू मिला था। मैं वो ले नहीं पाया। चार साल पहले मैंने हिंदी माध्यम में कोचिंग की। नोट्स बनाए। एक-एक टॉपिक के मैंने कम से कम तीन-तीन, चार-चार नोट्स बनाए। 2023 वाले प्री मेंस में जब पहली बार प्रीलिम्स पास आउट पास हुआ था 2023 में मेंस पास नहीं कर पाया। 204 का आईएस का मेंस में पास नहीं कर पाया। 15 नंबर से उस बार कट ऑफ मेरा रुका था। स सवाल: आपके पिताजी नौकरी करते हैं, उनका क्या योगदान रहा ? जवाब: पिताजी मेरे किसान हैं। बहुत कम खेत हैं। घर का खर्च नहीं चल पाता है। घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए और मेरी शिक्षा के लिए पिता ट्रैक्टर एजेंसी में मैनेजर के पद पर काम करते हैं। आप समझ सकते हैं कि घर पर क्या चुनौतियां आ रहीं होगी? सवाल: घर की ऐसी कंडीशन के बीच कैसे खुद को संभाला और तैयारी की? जवाब: मैं अपने हर प्रयास में बेहतर करता रहा। जब मैंने प्रीलिम्स निकाल लिया तो परिवार वालों ने मेरा हौसला बढ़ाया। बस यही मेरे लिए ताकत बना। फिर जब मैं मेंस लिखने गया तो मेंस में मेरे अच्छे नंबर आए। करीब 697 नंबर थे। फिर 2024 का मैंने अटेम्प्ट दिया। मैंने उस अटेम्प्ट में अपना ऑप्शनल बदलकर पॉलिटिकल साइंस कर लिया। मेरे 248 नंबर आए थे। मुझे अंदर से हमेशा से विश्वास था कि मैं इसको निकाल रहा हूं और निकाल लूंगा। सवाल: मां-बाप के अलावा किसका सपोर्ट रहा? जवाब: मुझे मेरे परिवार और खासकर मेरे पिता से सहयोग मिला। जिन्होंने अपनी हर कमाई मेरी पढ़ाई में लगा दी। मेरे बड़े पिताजी का भी सहयोग रहा। मेरे गुरु विनीत अनुराग सर ने बड़े भाई की तरह मुझे गाइड किया। 2022 में मेरे बड़े भाई का एक्सीडेंट में निधन हो गया। उस स्थिति में भी मेरे माता-पिता ने मुझे पढ़ाई से नहीं रोका। यह मेरी नहीं, उनकी जीत है। कई सीनियर्स और दोस्तों ने हर मुश्किल में साथ दिया कभी खाना पहुंचाया, कभी एग्जाम छोड़ने गए। इस शहर में मुझे कभी परिवार की कमी नहीं खली। मैंने एक भाई खोया, लेकिन यहां कई भाई मिल गए। सवाल: वो पल तो काफी कठिन रहा होगा जब एक बड़े भाई का साया छूट जाता है? जवाब: भाई मेरा तो केवल 23 साल का था। भाई उसकी नौकरी लगे बस एक महीने हुए थे। प्राइवेट में ही जॉब उसको मिली थी और मैं तब ग्रेजुएशन के सेकंड ईयर में था और सेकंड ईयर में मैंने तैयारी साथ में शुरू कर दी थी। पर वो जो वो जो छड़ था वो मेरे लिए तो था उस दौर में अचानक से लगा कि यह क्या हुआ? मतलब मुझे अपना भविष्य एकदम धुंधला दिख रहा था। मैं डेढ़ साल के लिए घर पे गया। उस बीच में कोविड आया तो पढ़ाई एकदम से मतलब जब रिदमम बनना शुरू हुआ तभी रिदमम खत्म हो गया। पर सर मतलब हर आवश्यकता मतलब हर जो क्या बोलते हैं कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है जो मुझे डेढ़ साल का समय मिला, बीच में कोविड का लॉकडाउन था और बीच में एग्जाम्स भी नहीं हो रहे थे। तो लगातार जो समय था उसमें मैंने साहित्य बहुत पढ़ा। ‘राम की शक्ति पूजा’ पढ़ी, निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’, प्रेमचंद पढ़ा, अलग-अलग लेखकों को, अज्ञेय को पढ़ा। तो साहित्य की दुनिया में मेरी रुचि जागी।और मुझे कहीं न कहीं एक मोटिवेशन भी मिलता रहा वहां से। सवाल: इस दौरान आपको किसका मार्गदर्शन मिला? जवाब: उसी दौर में आते हैं विनीत अनुराग सर, जो बड़े भाई की तरह उनका साथ पिछले छह-सात साल से है। वो लगातार मुझसे बात करते रहे, मुझे गाइड करते रहे, सही दिशा दिखाते रहे। वो एक कुम्हार की तरह थे, कभी उनसे डांट भी खाई है, उन्होंने मेरा मज़ाक भी उड़ाया है, उन्होंने मुझे प्यार से सहलाया भी है। तो मतलब इससे ज़्यादा मैं क्या कह सकता हूँ, तो एक समर्थन मिला सर। सवाल: आज के युवाओं के लिए आप क्या संदेश देना चाहते हैं जो तैयारी कर रहे हैं? जवाब: तैयारी करने वालों के लिए सबसे जरूरी है कि वे किसी भी परीक्षा की मूल मांग और सिलेबस को अच्छे से समझें। सिलेबस और पीवाईक्यू ही एग्जाम को समझने और उसे सही तरीके से नेविगेट करने में मदद करते हैं। मेरे अनुभव में, पढ़ाई से ज्यादा समय एग्जाम को समझने में लगा। जब एक बार सिलेबस समझ आ जाए, तो बेसिक किताबों को लगातार पढ़ना, रिवाइज करना और बार-बार दोहराना जरूरी है। सबसे अहम बात यह है कि बिना सवाल लगाए पढ़ाई का कोई मतलब नहीं है-जितना ज्यादा प्रैक्टिस करेंगे, उतना ही बेहतर निखरेंगे। आई थिंक रहीम दास जी का दोहा है कि ‘करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’। तो आप जब जितना अभ्यास करते हैं, आप उतना अधिक निखरते जाते हैं। तो जितना आप प्री है, मेन्स है, इस पर जितना ही अधिक आप सवाल लगाएंगे, जितना अधिक उसमें उलझेंगे तो मैं दो लाइनों से बात खत्म करता हूँ कि ‘खुसरो दरिया प्रेम का उलटी वाकी धार, जो उतरा सो डूब गया जो डूबा सो पार।’ तो पहले डूबिए फिर आप पार हो जाएंगे।

Source: Dainik Bhaskar via DNI News (Prayagraj)

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