लखनऊ के कुर्मांचल नगर स्थित मोहन सिंह बिष्ट सभागार में रविवार को उत्तराखण्ड महापरिषद, लखनऊ के रंगमण्डल द्वारा सामाजिक नाटक ‘दो अकेली’ का मंचन किया गया। इस नाटक ने दर्शकों को रिश्तों, दर्द और अकेलेपन की सच्चाई से संवेदनशील तरीके से रूबरू कराया। कार्यक्रम का आयोजन भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से हुआ। कार्यक्रम का शुभारम्भ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। मुख्य अतिथि डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय, महापरिषद के संयोजक दीवान सिंह अधिकारी और अध्यक्ष हरीश चन्द्र पंत ने दीप जलाकर मंचन की शुरुआत की। इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय को पुष्पगुच्छ और अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया गया। बहनों के जीवन संघर्ष को दिखाया गया नाटक ‘दो अकेली’ की कहानी दो बहनों के जीवन संघर्ष पर आधारित है। एक बहन पति के अत्याचारों का सामना करती है, जबकि दूसरी कम उम्र में विधवा होकर जीवन की चुनौतियों से जूझती है। दोनों बहनें एक-दूसरे का सहारा बनती हैं, लेकिन परिस्थितियाँ उन्हें फिर से अकेला कर देती हैं। यह कहानी रिश्तों की जटिलता और अकेलेपन को दर्शाती है। रिश्तों की अहमियत समाज को मजबूत बनाती है कान्ता शर्मा द्वारा लिखित इस कहानी का निर्देशन डॉ. पूर्णिमा पाण्डेय ने किया, जबकि रोजी मिश्रा सह-निर्देशक थीं। नाटक ने यह संदेश दिया कि अकेलापन केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी होता है, और रिश्तों की अहमियत समाज को मजबूत बनाती है। कलाकारों ने अपने अभिनय से पात्रों को जीवंत कर दिया। सुषमा शुक्ला ने नसीबन, अनीता वर्मा ने जीनत, महेन्द्र गैलाकोटी ने सज्जन मियां, योगेश शुक्ला ने जलाल, वंश शुक्ला ने छोटू और अनुपम बिसरिया ने सूत्रधार की भूमिका निभाई। उनके सशक्त संवाद और भाव-भंगिमाओं ने दर्शकों को प्रभावित किया।नाटक का यथार्थ चित्रण इसकी मुख्य विशेषता रही, जिसमें महिलाओं के दर्द, रिश्तों की सच्चाई और मानवीय संवेदनाओं को गहराई से प्रस्तुत किया गया।

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