लखनऊ स्थित कैफी आजमी अकादमी में रविवार को कवयित्री शालिनी सिंह के कविता संग्रह ‘धूप के बंद दरवाजे’ का विमोचन किया गया। इस कार्यक्रम में साहित्यकारों, कवियों और श्रोताओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन सलमान खयाल ने किया, जिन्होंने शालिनी सिंह को लेखकीय वक्तव्य के लिए आमंत्रित किया। अपने संबोधन में शालिनी सिंह ने परिवार और मित्रों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने साहित्य को कमजोरों की कर्मभूमि बताया और कहा कि साहित्यकार उनकी आवाज़ बनते हैं। वर्तमान में बढ़ती सांप्रदायिकता पर चिंता व्यक्त की शालिनी सिंह ने अपने लेखन पर लोकगीतों के प्रभाव और कोविड काल की यादों का जिक्र किया। उन्होंने वर्तमान में बढ़ती सांप्रदायिकता पर चिंता व्यक्त करते हुए समाज और सत्ता दोनों से सवाल करने की आवश्यकता पर बल दिया। इस अवसर पर उन्होंने अपने संग्रह से ‘धूप के बंद दरवाजे’, ‘यात्राओं के अनुवाद’ और ‘आकार में छोटी हर चीज़ स्त्रीलिंग नहीं होती’ कविताओं का पाठ भी किया। कविता संग्रह पर चर्चा करते हुए सीमा सिंह ने कहा कि शालिनी की कविताओं में स्त्री चेतना के साथ सामाजिक सरोकार भी गहराई से जुड़े हैं। उन्होंने प्रेम और प्रकृति चित्रण की सराहना की और धर्म तथा राजनीति पर लिखने को एक साहसिक कदम बताया। शालिनी की कविताएं उम्मीद का संदेश विभु प्रकाश सिंह ने टिप्पणी की कि इस दौर में कविताएं प्रार्थना की तरह हैं, जिनमें समाज और समय का प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। उन्होंने कवियों की नैतिक जिम्मेदारी पर जोर देते हुए कहा कि शालिनी की कविताएं उम्मीद का संदेश देती हैं।समीना खान ने शालिनी सिंह को बधाई दी और उनके साथ अपने अनुभव साझा किए। कार्यक्रम के दूसरे सत्र में शालू शुक्ला के संचालन में अनिल मिश्र, विशाल श्रीवास्तव, सीमा सिंह, अनुजा शुक्ला और अवंतिका सिंह ने अपनी कविताओं का पाठ किया।आयोजकों ने बताया कि सोमवार को अपराह्न 3:30 बजे इसी अकादमी में सुभाष राय की पुस्तक ‘आत्मसंभवा आंडाल’ का विमोचन भी किया जाएगा।

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