बीएचयू की टीम दक्षिण भारत जाएगी जहां से अजनाला के सैनिकों के परिवार से सैंपल लिए जाएंगे और उनका विस्तृत विश्लेषण किया जाएगा। जॉर्जिया के क्वीन केटेवन के 400 वर्ष पुरानी हत्या को सुलझाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मन की बात कार्यक्रम में देश के पुरातत्वविदों और जेनेटिक एक्सपर्ट्स की प्रशंसा की थी। यह बात जीन वैज्ञानिक ज्ञानेश्वर चौबे ने कही। उन्होंने सुरिंदर कोच्चर द्वारा किए गए अजनाला मामले पर यूजीसी-मालवीय मिशन टीचर ट्रेनिंग सेंटर बीएचयू में चल रहे फोकस्ड ट्रेनिंग एंड इंडक्शन प्रोग्राम के तहत प्रतिभागी शिक्षकों को यह जानकारी देते दिया लैब में किस तरह से मानव जीवन पर रिसर्च होता है उनको बताया। अंग्रेजों ने सैनिकों की लाशों पर चूना-कोयला डाला, फिर कुआं बंद कर दिया सुरेंद्र कोछड़ की कोशिशों के बाद 2014 में खुदाई हुई और अवशेष सामने आए। इन कंकालों की जांच के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी के एंथ्रोपोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. जेएस सहरावत की लीडरशिप में एक टीम बनी। इस टीम में BHU के प्रोफेसर बीरबल साहनी, प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे और द सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (CCMB) हैदराबाद के एक्सपर्ट शामिल हैं। दैनिक भास्कर ने प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे से साइंटिफिक फाइंडिंग्स पर बात की। वे बताते हैं, ‘मुझे जलियांवाला बाग हत्याकांड की जानकारी थी, लेकिन अजनाला केस कभी नहीं सुना था। अजनाला में कंकाल मिले, तो जांच की जिम्मेदारी अलग-अलग टीम को दी गई। हम लोग हैदराबाद के साथ मिलकर काम करने लगे।’ ‘कुएं की खुदाई सही तरीके से न होने से ज्यादातर सैंपल खराब हो चुके थे। कंकाल से डीएनए निकालने में इसलिए भी दिक्कत हुई क्योंकि अंग्रेजों ने सैनिकों को कुएं में डालने के बाद जानबूझकर उसमें चूना और कोयला डाल दिया था। इसके साथ मिट्टी भर दी थी। इससे हर लाश तक कोयला और चूना पहुंच गया था। ये दोनों चीजें डीएनए को खराब कर देती हैं।’ ‘हमें शुरू में 244 सैंपल मिले थे। 100 के आसपास हैदराबाद लैब भेजे गए थे। केवल 50 सैंपल से ही हम डीएनए अलग निकाल पाए। इसकी जांच आगे बढ़ती गई और रिजल्ट आने लगे। तब पता चला कि अजनाला कुएं में मरने वाले सैनिक तो गंगा घाटी के ही लोग थे। यानी हमारे वाराणसी के आसपास वाले यूपी-बिहार के ही सैनिक थे।’ अब जानिए अन्य प्रोफेसर ने क्या जानकारी साझा की चंचल देवनानी ने बताया की भारत के सिंधी पाकिस्तानी सिंधी लोगों से ज़्यादा भारतीयों के निकट हैं । देवांश ने हिंदी प्रकाशन समिति द्वारा विज्ञान के प्रचार-प्रसार में हिंदी भाषा के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने के सराहनीय प्रयासों की जानकारी दी। डॉ. चन्दना बसु (सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स, बीएचयू) ने बताया कि फिंगरप्रिंट का निर्माण अंग विकास (limb development) से जुड़े जीनों द्वारा नियंत्रित होता है, न कि केवल त्वचा की पैटर्निंग से। उन्होंने अपने 2022 में प्रकाशित विश्व-प्रसिद्ध Cell जर्नल के शोध-पत्र का हवाला देते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय टीम के साथ किए गए जीनोम वाइड एसोसिएशन स्टडी में 43 फिंगरप्रिंट-संबंधित म्युटेशन की पहचान की गई। इनमें ईवीआई 1 जीन के पास स्थित वेरिएंट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जो अंगों के विकास को प्रभावित कर फिंगरप्रिंट के आकार (arch, loop, whorl) को निर्धारित करता है। यू.जी.सी-मालवीय ममशन शिक्षक प्रशिक्षण सेंटर के डायरेक्टर प्रोफेसर आनंद वर्धन शर्मा ने बताया कि ट्रेनिंग कार्यक्रम 19 अप्रैल 2026 तक चलेगा। कार्यक्रम में विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ रिसोर्स पर्सन के रूप में व्याख्यान दे रहे हैं, जिससे उच्च शिक्षा में गुणवत्ता वृद्धि के साथ-साथ शिक्षकों के ज्ञान एवं कौशल का विकास हो रहा है।

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