इलाहाबाद लखनऊ खंडपीठ ने ग्राम सभा की जमीन पर बनी मस्जिद से तहसीलदार के बेदखली के आदेश को सही मानते हुए उसे बरकरार रखा है। न्यायालय ने कहा है कि न तो तहसीलदार के आदेश में और न ही अपर जिलाधिकारी द्वारा अपील खारिज किए जाने के आदेश में कोई गलती है। हालांकि, न्यायालय ने याचियों पर लगा 36 हजार रुपये का जुर्माना निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि खलिहान के तौर पर दर्ज प्रश्नगत जमीन पर मस्जिद का निर्माण करने में याचियों की कोई भूमिका नहीं पाई गई। यह निर्णय न्यायमूर्ति आलोक माथुर की एकल पीठ ने शाहबान व अन्य की ओर से दाखिल याचिका पर पारित किया। याचियों ने तहसीलदार और अपर जिलाधिकारी (न्यायिक) द्वारा पारित आदेशों को चुनौती दी थी। मामला लखनऊ के बख्शी का तालाब तहसील अंतर्गत ग्राम अस्ति स्थित गाटा संख्या 648 की भूमि से संबंधित है। यह भूमि राजस्व अभिलेखों में खलिहान के तौर पर दर्ज है, जो ग्राम सभा की संपत्ति है। प्रशासन ने कब्जा का आरोप लगाया था प्रशासन का आरोप था कि इसी भूमि पर अवैध रूप से कब्जा कर मस्जिद का निर्माण कर लिया गया है। वहीं, याचियों का कहना था कि मस्जिद का निर्माण करीब 60 वर्ष पूर्व स्थानीय मुस्लिम समुदाय द्वारा किया गया था और यह कोई नया अतिक्रमण नहीं है। उन्होंने यह भी दलील दी कि वे सिर्फ नमाज पढ़ने के लिए वहां जाते हैं और मस्जिद के प्रबंधन से उनका कोई संबंध नहीं है। साथ ही याचियों ने सुनवाई की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें गवाहों से जिरह का अवसर नहीं दिया गया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यूपी राजस्व संहिता की धारा 67 के तहत इस प्रकार के मामलों में कार्यवाही संक्षिप्त प्रक्रिया के द्वारा होती है, जिसमें शपथ पत्रों के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है। हर मामले में गवाहों की जिरह अनिवार्य नहीं है। न्यायालय ने पाया कि प्रश्नगत भूमि ग्राम सभा की है और याची उस पर कोई वैध अधिकार, स्वामित्व या हित सिद्ध नहीं कर सके। इसी आधार पर बेदखली का आदेश सही माना गया।

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