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गाजीपुर में 6 साल की बच्ची से दुष्कर्म:इलाज में 4 घंटे देरी, परिवार का धरना; सीएमओ ने मानी लापरवाही

गाजीपुर में गुरुवार को 6 साल की एक बच्ची के साथ दुष्कर्म का मामला सामने आया। पड़ोसी युवक द्वारा की गई इस वारदात के बाद बच्ची को इलाज के लिए अस्पताल लाया गया, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही के चलते परिवार को करीब 3 घंटे 45 मिनट तक अस्पताल के बाहर इंतजार करना पड़ा। इस दौरान बच्ची दर्द से कराहती रही, जबकि परिजन इलाज शुरू कराने के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक भटकते रहे। मामला नंदगंज थाना क्षेत्र के एक गांव का है। गुरुवार सुबह करीब 10 बजे बच्ची अपने घर के बाहर खेल रही थी। आरोप है कि पड़ोस में रहने वाला युवक उसे बहला-फुसलाकर पास के एक सुनसान खंडहर में ले गया, जहां उसने उसके साथ दुष्कर्म किया। कुछ देर बाद बच्ची लहूलुहान हालत में मिली तो परिवार के होश उड़ गए। परिजनों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी। बच्ची के पिता की तहरीर पर नामजद FIR दर्ज की गई, जिसके बाद पुलिस बच्ची को मेडिकल और इलाज के लिए अस्पताल लेकर पहुंची। रात 8 बजे से 11:45 बजे तक इलाज शुरू होने का इंतजार परिवार का आरोप है कि बच्ची को गुरुवार रात 8 बजे अस्पताल लाया गया, लेकिन इलाज शुरू होने में रात 11:45 बजे तक का समय लग गया। इस दौरान बच्ची को समय पर चिकित्सकीय सहायता नहीं मिल सकी। परिजन लगातार डॉक्टरों और अधिकारियों से गुहार लगाते रहे, लेकिन इलाज की बजाय उन्हें इधर-उधर भेजा जाता रहा। महिला अस्पताल और ट्रॉमा सेंटर के बीच फंसी बच्ची पीड़ित परिवार के मुताबिक, वे पुलिस के साथ पहले राजकीय महिला अस्पताल पहुंचे। वहां से उन्हें कभी नंदगंज थाना, कभी गोरा बाजार ट्रॉमा सेंटर और फिर वापस महिला अस्पताल भेजा गया। इलाज में देरी की बड़ी वजह महिला अस्पताल और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) कार्यालय के बीच ‘अधिकार क्षेत्र’ को लेकर चल रही खींचतान रही। इसी असमंजस में बच्ची को तत्काल उपचार नहीं मिल सका। अस्पताल गेट पर धरने पर बैठा परिवार, जुट गई भीड़ स्वास्थ्य विभाग की इस संवेदनहीनता से नाराज परिजन रात 8 बजे के बाद अस्पताल गेट पर ही धरने पर बैठ गए। बच्ची को तत्काल इलाज न मिलने से लोगों में भी आक्रोश फैल गया। देखते ही देखते अस्पताल परिसर में भारी भीड़ जमा हो गई। परिवार का कहना था कि बच्ची गंभीर हालत में थी, लेकिन विभागीय खींचतान में उसकी तकलीफ को नजरअंदाज किया गया। CMO ने माना- इलाज में हुई लापरवाही मामले ने तूल पकड़ा तो जिलाधिकारी अविनाश कुमार ने संज्ञान लिया और CMO सुनील पांडे को मौके पर भेजा। अस्पताल पहुंचने के बाद CMO ने माना कि बच्ची के इलाज में देरी हुई है और उसे समय पर उपचार मिलना चाहिए था। उन्होंने कहा कि इस मामले में जो भी डॉक्टर या कर्मचारी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। SDM और SP ग्रामीण भी पहुंचे, परिजनों को समझाया मामले की गंभीरता को देखते हुए सदर SDM रवीश गुप्ता और SP ग्रामीण अतुल सोनकर भी अस्पताल पहुंचे। अधिकारियों ने परिजनों को समझाने की कोशिश की और इलाज जल्द शुरू कराने का भरोसा दिलाया। भारी हंगामे और प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद आखिरकार बच्ची का इलाज शुरू हो सका। लेडी डॉक्टर के बयान पर भी उठा विवाद धरने के दौरान महिला डॉक्टर प्रीति पाल और मीडिया के बीच तीखी बहस भी हुई। परिजनों का आरोप था कि बच्ची को इलाज देने के बजाय जिम्मेदारी टाली जा रही थी। डॉ. प्रीति पाल ने कहा कि बच्ची को बेड दिया गया था, लेकिन परिजनों ने मना कर दिया। जब उनसे पूछा गया कि अगर इलाज की व्यवस्था थी तो परिवार धरने पर क्यों बैठा है, तो उन्होंने कहा कि इलाज मेडिकल कॉलेज में होना है। बाद में उन्होंने पत्रकारों पर भी मामला ‘हाईलाइट’ करने का आरोप लगाया। इस बयान के बाद स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली और संवेदनशीलता पर और सवाल खड़े हो गए। सवाल सिर्फ इलाज में देरी का नहीं, सिस्टम की संवेदनशीलता का है इस पूरे मामले ने एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की तैयारियों और संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक दुष्कर्म पीड़िता बच्ची, जिसे तत्काल इलाज और चिकित्सकीय देखभाल मिलनी चाहिए थी, उसे घंटों तक ‘रेफर-रेफर’ के खेल में फंसाए रखा गया।

Source: Dainik Bhaskar via DNI News (Prayagraj)

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