गर्मियों में भगवान को शीतलता प्रदान करने के उद्देश्य से भक्त उनके लिए तरह तरह के इंतजाम करते हैं। ब्रज के मंदिरों में गर्मियों में भगवान के लिए फूल बंगला में विराजमान करने की परंपरा है। यहां किसी मंदिर में एक दिन,किसी 5 दिन तो किसी में 108 दिन फूल बंगला बनाए जाते हैं। विश्व प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में इस बार 108 दिन नहीं बल्कि 138 दिन फूल बंगला बनाए जाएंगे। शीतलता प्रदान करने के लिए बनाए जाते हैं फूल बंगला ब्रज में भगवान की भाव की सेवा है। यहां भक्तों के आराध्य भगवान को ऋतु अनुसार सेवा की जाती है। सर्दियों में भगवान को गर्म कपड़े धारण कराने के साथ साथ उनके भोग में बदलाव किया जाता है तो सर्दी से राहत के लिए उनके सम्मुख अंगीठी रखी जाती है। इसी तरह गर्मियों में भगवान को प्राकृतिक तरीके से शीतलता दी जाती है। मंदिरों में भगवान को भक्त फूलों से बने बंगले में विराजमान करते हैं। वृंदावन के 3 घरानों का रहा है योगदान इतिहासकार प्रह्लाद बल्लभ गोस्वामी बताते हैं कि स्वामी हरिदास, महाप्रभु बल्लभाचार्य तथा गोस्वामी विठ्ठलनाथ के प्रयासों से विक्रम संवत 1600 के आसपास ब्रज के मंदिर देव स्थानों में अंकुरित हुई फूल बंगला एवं श्रृंगार कला को पल्लिवित करने में मुख्यतः ब्रज वृन्दावन के श्री हरिदास बिहारी घराना, राधावल्लभ घराना व गोपेश्वर घराना नामक तीन प्रमुख घरानों का योगदान है। इन घरानों के गोस्वामी लक्ष्मीनारायण, ब्रजबल्लभ, छबीलेबल्लभ, ललितबल्लभ, शरण बिहारी, शिवचरण, गिर्राज प्रसाद, गिरधारी लाल, नत्थीलाल आदि अनेक कलाकारों को लोग आज भी याद करते हैं। बंगले के फ्रेम में होते हैं 100 से ज्यादा हिस्से श्रीहरिदासीय सम्प्रदाय के चौदहवें आचार्य ब्रजबल्लभ महाराज बंगला कला के सर्वगुण सम्पन्न कलाकार थे। उनके द्वारा कपड़े व कागज की बनाई गई सखियाँ, आज तक उदाहरण बनी हुयी हैं। रूई का बोलता हुआ लंगूर तो उनके अतिरिक्त आज तक कोई नहीं बना पाया। इतिहासकार आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी के अनुसार बंगला निर्माण हेतु करीब 100 हिस्सों में बनी हुई शीशम सागवान की टटियायें (फ्रेम) उपयोग में आती हैं। अगली, बगली, रहल, टहल, सखी, विछैया, दरबाजे, महल, सिंहासन, शिखर, मार्का, बुर्जी, झोपड़ी, सीढ़ी, गौख, छत्री, छप्पर, छज्जे, तिदरी, नौका, रथ, घोड़ा, योगपीठ, झाड इत्यादि नामक इन टटियाओं में एक निश्चित अन्तराल पर लगी कीलों (चोबों) में मोतिया, मौगरा, मौलश्री, रायबेल, लिलि, गेंदा, गुलाब, रजनीगंधा आदि की लड़ियों से चौमासी, छैमासी, बारहमासी, वृन्दावनी नामक भराव करने के उपरान्त चक्रव्यूह प्रणाली के कमल, अष्टकमल, गुलाब, स्वास्तिक, श्री रूपी जाल तोड़े जाते हैं। इन जालों की विशेषता है कि इन्हें प्रायः एक छोर से आरम्भ कर दूसरे छोर पर पूर्ण किया जाता है, जिससे आम दर्शनार्थी इनके आदि-अन्त नहीं दूढ़ पाते। इसके बाद टटियाओं में चस (वार्डर) लगा कर सुविधायें लटकायी जाती हैं तथा चौखट पर फूल के बटुआ एवं गुलाब तथा हरी पत्ती के बटन, बादला से चित्ताकर्षक बन्दनवार बनायी जाती हैं। केले के तने से बनाई जाती हैं भगवान की निकुंज लीला इतिहासकार प्रह्लाद बल्लभ गोस्वामी के मुताबिक बिछैयाओं में केले के पेड़ की ऊपरी पर्त से मढ़ाई करके, अन्दरुनी पर्त को काट-काट कर होली महोत्सव, झूलनोत्सव, बैनीगूँथन, माखन चोरी, ऊखल बंधन, चीरहरण, कालिया मान मर्दन, केशीवध, बकासुर – सकटासुर वध, द्रोपदी मान रक्षा, गीता उपदेश, गजेन्द्रमोक्ष, सूरश्याम, उद्धव गोपी, कृष्ण सुदामा, गौचारण, महारास, सन्तसमागम इत्यादिक निकुंजलीलाओं के जीवंत दृश्य अंकित किये जाते हैं। दरवाजों में फूल सहित केला, कपड़ा, कागज आदि से सजावट की जाती है। सांस्कृतिक रस संवाहक फूल बंगलों की आरम्भिक बेला में फूल, केला, कपड़ा, कागज, गोटा आदि का ही प्रयोग किया जाता था। किन्तु धीरे धीरे इनके विकसित होने पर अब मिठाई, फल, सब्जी, मेवा, चांदी के सिक्के तथा नोटों की सजावट भी की जाने लगी है। वृंदावन के अलावा दिल्ली अहमदाबाद और बेंगलुरु से आता है फूल आध्यात्मिक चेतनापुंज फूलबंगलों का निर्माण आर्थिक पक्ष के अनुसार ही होता है। पुष्यसेवा के लिये समूचे विश्व में विख्यात वृन्दावन स्थित ठाकुर बाँके बिहारी जी महाराज के मंदिर में सर्वाधिक बंगले सजाए जाते हैं। छोटा बंगला होने पर तो स्थानीय फूल मंडियों जैसे वृन्दावन, मथुरा, आगरा से ही पर्याप्त फूल मिल जाता है। परन्तु बड़ा बंगला होने पर दूर-दराज की फूल मण्डियों जैसे दिल्ली, अहमदाबाद, बैंगलोर आदि से फूल उपलब्ध कराना पड़ता है। बंगला बनवाने की बावत भक्तों को कई कई महीनों पहले से आरक्षण कराना पड़ता है। क्योंकि बंगले तो सालभर में एक निर्धारित संख्या में ही बनते हैं, परन्तु सजवाने के इच्छुक सेवक हजारों होते हैं। इस वर्ष 138 दिन बनेंगे फूल बंगला प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ला एकादशी से श्रावण कृष्ण पक्ष की हरियाली अमावस्या तक मंदिरों में आयोजित होने वाली ग्रीष्मकालीन भावसेवा के अंतर्गत एक से बढ़कर एक सुन्दर बंगले सजाए जाते हैं। इस बार 29 मार्च से फूल बंगलो उत्सव शुरू होगा। इन फूल बंगलों में विराजमान ठाकुरजी के दर्शन कर हृदय अत्यधिक आनन्द निमग्न हो उठता है। मन्दिर में हर ओर पुष्प, इत्र, गुलाब जल की महक उठती रहती है। लेकिन इस बार पुरुषोत्तम माह होने के कारण बांके बिहारी मंदिर में फूल बंगला 138 दिन बनेंगे। इस तरह सुबह शाम बनने वाले फूल बंगला की संख्या करीब 275 होगी। बंगला बनवाने के लिए करना होगा दस गुना ज्यादा शुल्क जमा बांके बिहारी मंदिर में बनने इसके फूल बंगला के लिए पिछले साल तक 15 हजार रुपए मंदिर कार्यालय में जमा कराने होते थे। लेकिन इस बार हाई पावर मैनेजमेंट कमेटी ने यह राशि बढ़ाकर डेढ़ लाख रुपए कर दी है। इस तरह प्रतिदिन 3 लाख रुपए मंदिर कोश में जमा होंगे। मंदिर कार्यालय की तरफ से इसकी सूचना चस्पा करा दी गई है।

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