इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक नाबालिग बच्ची को धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।
कोर्ट ने कहा कि पहले बच्ची की वास्तविक पितृत्व (बायोलाजिकल पैरेंट्स) की पुष्टि के लिए डीएनए टेस्ट कराया जाना आवश्यक है।
जस्टिस मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में पिता और बेटी दोनों को जैविक सच्चाई जानने का पूरा अधिकार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि वास्तविक पिता की पहचान स्पष्ट नहीं होगी, तो यह दोनों के जीवन को लंबे समय तक प्रभावित करेगा और वे समाज में सामान्य जीवन नहीं जी पाएंगे। फैमिली कोर्ट ने पहले नाबालिग लड़की के पक्ष कोर्ट ने यह आदेश जवाहिर लाल जायसवाल द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर पारित किया गया। याचिका में सोनभद्र के फैमिली कोर्ट के मार्च 2025 के आदेश को चुनौती दी गई थी। फैमिली कोर्ट ने पहले नाबालिग लड़की के पक्ष में फैसला देते हुए पिता को आवेदन की तारीख से 3000 प्रति माह और आदेश की तारीख से 6000 प्रति माह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया था।
साथ ही डीएन टेस्ट की मांग को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट में पिता ने तर्क दिया कि उनकी शादी 1994 में हुई थी, लेकिन उनकी पत्नी 2000 में घर छोड़कर चली गई थी और बाद में किसी अन्य व्यक्ति के साथ रहने लगी। उनका दावा था कि 2011 में जन्मी बच्ची उस अवैध संबंध से पैदा हुई है और उनका उससे कोई जैविक संबंध नहीं है। वहीं, बच्ची की ओर से यह कहा गया कि फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और बच्ची वास्तव में याचिकाकर्ता की ही संतान है। रिकॉर्ड की जांच के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि मामले में कई विरोधाभास हैं। जहां एक ओर कहा गया कि बच्ची का जन्म 1 जनवरी 2011 को हुआ, वहीं जन्म प्रमाण पत्र में 20 नवंबर 2009 की तारीख दर्ज थी। इसके अलावा एक अन्य मेडिकल रिकॉर्ड में 2017 में दूसरे बच्चे के जन्म का उल्लेख था, जिसमें कथित साथी को पिता बताया गया था। कोर्ट ने यह भी कहा कि यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि 2000 के बाद महिला कब और कितनी बार अपने पति के साथ रही, कब गर्भधारण हुआ और बच्ची का वास्तविक पिता कौन है। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने माना कि पितृत्व को लेकर गंभीर संदेह है और सच्चाई जानने के लिए डीएनए टेस्ट आवश्यक है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार डीएनए टेस्ट सामान्य रूप से आदेशित नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन इस मामले की विशेष परिस्थितियों में यह जरूरी है। अंत में हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द करते हुए निर्देश दिया कि पहले पिता और बच्ची का डीएनए टेस्ट कराया जाए। इसके बाद फैमिली कोर्ट तीन महीने के भीतर नए सिरे से भरण-पोषण के मामले पर निर्णय ले।

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