इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि कार्यकारी निर्देश न्यायिक निर्देशों को रद्द नहीं कर सकते, न ही वे अर्जित अधिकारों को समाप्त कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा सुप्रीम कोर्ट नीरज कुमार पाण्डेय केस में तय कर चुका है कि सीनियर बेसिक स्कूलों में सहायक अध्यापक भर्ती में खाली पदों पर कट आफ मार्क से अधिक अंक पाने वाले अभ्यर्थियों की नियुक्ति पर विचार किया जाएं। कानून के अनुसार नियुक्ति की पेशकश कोर्ट ने कहा- ऐसे अभ्यर्थियों को कानून के अनुसार नियुक्ति की पेशकश की जानी चाहिए। याचिकाकर्ता शर्तों को पूरा करती है, क्योंकि उसने समय रहते ही इस न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और उसके अंक अंतिम चयनित उम्मीदवार से अधिक हैं। इसलिए, याचिकाकर्ता को विचार-सूची से बाहर रखने की प्रतिवादियों की कार्रवाई सर्वोच्च न्यायालय के बाध्यकारी निर्देशों का सीधा उल्लंघन है, जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत प्रवर्तनीय हैं। कोर्ट ने कहा योग्यता और पात्रता होने के बावजूद याचिकाकर्ता को नियुक्ति से वंचित करना, एक प्रकार का भेदभावपूर्ण व्यवहार है। कट-ऑफ अंकों से अधिक अंक प्राप्त किए थे कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता, जिसने कट-ऑफ अंकों से अधिक अंक प्राप्त किए थे, नियुक्ति की हकदार हैं। कोर्ट ने 03.दिसंबर 2022 के याची को नियुक्ति देने से इंकार के आदेश को मनमाना, अवैध और अस्थिर करार दिया है। कोर्ट ने सचिव बेसिक शिक्षा परिषद प्रयागराज व जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी मुरादाबाद को याची की सहायक अध्यापक साइंस पर नियुक्ति पर विचार करने का निर्देश दिया है और रिपोर्ट मांगी है। याचिका की अगली सुनवाई 2अप्रैल को होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने दीप्ति चौहान की याचिका पर दिया है। याची का कहना था कि 2013 की सीनियर बेसिक स्कूलों में 29334 सहायक अध्यापक भर्ती में साइंस अध्यापक पद पर चयनित हुईं। किंतु चयन सूची में शामिल नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने विचार करने का निर्देश दिया तो बी एस ए ने प्रत्यावेदन निरस्त कर दिया।जिसे फिर से चुनौती दी गई। मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। याची का कहना है कि अभी भी पद खाली है, इसलिए उसकी नियुक्ति की जाय।जबकि परिषद का कहना था कि भर्ती प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन करने का आदेश दिया, जिसमें कहा गया है कि अंतिम चयनित से अधिक अंक पाने वालों की भी नियुक्ति की जाय।जिस पर हाईकोर्ट ने यह आदेश दिया है।

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