मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह और नगर आयुक्त अंकित खंडेलवाल के बीच बढ़ रही खींचतान के बीच नगर निगम ने पलटवार करते हुए बैठक में बाहरी व्यक्तियों के शामिल होने पर सवाल खड़े किए हैं। नगर निगम प्रशासन की ओर से शासनादेश का वह आदेश भी सार्वजनिक किया गया है, जिसके तहत सदन में होने वाली बैठक में बाहरी व्यक्तियों की एंट्री नहीं हो सकती।
नगर निगम प्रशासन ने कहा है-उत्तर प्रदेश सरकार ने स्थानीय नगर निकायों में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के कार्यों में उनके पति अथवा अन्य संबंधियों द्वारा हस्तक्षेप किए जाने की बढ़ती शिकायतों पर कड़ा संज्ञान लेते हुए सख्त दिशा-निर्देश जारी किए हैं। नगर विकास अनुभाग-1 द्वारा जारी आदेश में स्पष्ट किया गया है कि इस प्रकार की दखलंदाजी न केवल अनुचित है, बल्कि संबंधित अधिनियमों के प्रावधानों के भी विपरीत है। नगर निगम सचिवालय का आदेश
उत्तर प्रदेश नगर निगम अधिनियम, 1959 तथा उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916 में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि केवल वही व्यक्ति निकाय के प्रशासनिक कार्यों में भाग ले सकता है, जिसे जनता द्वारा निर्वाचित किया गया हो। इसके अतिरिक्त कोई भी अन्य व्यक्ति-चाहे वह पति, रिश्तेदार या कोई अन्य हो, बैठकों में भाग लेने या प्रशासनिक निर्णयों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं रखता। निर्देशों में कहा गया है-कई स्थानों पर पदाधिकारियों के स्थान पर उनके पति या संबंधी बैठकों में भाग लेते हैं और निर्णयों को प्रभावित करते हैं, जो पूरी तरह से अवैध है। इस पर रोक लगाने के लिए शासन ने पूर्व में जारी कई शासनादेशों का हवाला देते हुए पुनः स्पष्ट किया है कि नगर निगम, नगरपालिका परिषद और नगर पंचायत की बैठकों में केवल निर्वाचित अथवा पदेन अधिकारी ही शामिल होंगे। किसी भी अन्य व्यक्ति को बैठक में उपस्थित होने या अपनी राय देने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसके साथ ही यह भी निर्देश दिया गया है कि पदाधिकारियों के किसी भी संबंधी को निकाय के अभिलेख देखने की अनुमति नहीं होगी, जब तक कि वे विधिवत आवेदन कर नगर आयुक्त या अधिशासी अधिकारी से लिखित स्वीकृति प्राप्त न कर लें।
शासन ने सभी संबंधित अधिकारियों को निर्देशित किया है कि इन आदेशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाए। यदि किसी भी स्तर पर उल्लंघन की जानकारी मिलती है, तो सत्यापन के बाद दोषियों के खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।

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