लखनऊ विश्वविद्यालय के टैगोर लाइब्रेरी परिसर में स्थित गांधी प्रतिमा के पास गुरुवार को ‘कलरव’ छात्र समूह द्वारा एक कला प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। “बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे” शीर्षक वाली इस प्रदर्शनी में कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड क्राफ्ट के छात्रों ने अपनी कलाकृतियों के माध्यम से समाज और व्यवस्था से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठाए। छात्रों ने इस आयोजन के माध्यम से स्पष्ट संदेश दिया कि कला केवल सौंदर्य का प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाज में संवाद और परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम भी है। यह प्रदर्शनी ऐसे समय में आयोजित की गई जब विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस चल रही है, जिससे यह पहल और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। कलाकृतियों ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया प्रदर्शनी में विभिन्न छात्रों की कलाकृतियों ने दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। हैंडक्राफ्ट श्रेणी में आन्या चौधरी और श्वेता यादव की रचनाएँ सराही गईं। पेंटिंग प्रदर्शनी में नीरज वर्मा, पूर्वी, निखिल, अवंतिका, दिव्यांशी चौधरी, गोल्डी, पूर्णिमा पाठक, स्रस्ती, रुख्मिनी निषाद, नितिन, जान्हवी, संतोष वर्मा, अतुल वर्मा, रितेश कपूर, कृष्णा यादव, अनुज चौबे, रुद्र प्रताप सिंह और शनि जैसे कई छात्रों ने अपने अनुभवों और विचारों को रंगों के माध्यम से प्रस्तुत किया। आयोजकों ने बताया कि यह आयोजन केवल एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि एक विशेष सोच का परिणाम है। नितिन ने कहा, “जब संस्थान सवालों से बचने लगते हैं, तब कला उन सवालों को और मजबूती से सामने लाती है।” नीरज ने इसे एक नई शुरुआत बताते हुए कहा कि कला को केवल दीवारों तक सीमित न रखकर आम लोगों तक पहुँचाना आवश्यक है। समाज से जोड़ना महत्वपूर्ण है छात्रों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व पर भी जोर दिया। जान्हवी शर्मा ने कहा कि अभिव्यक्ति का अधिकार केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसे व्यवहार में लाना पड़ता है। अतुल वर्मा के अनुसार, कला को समाज से जोड़ना महत्वपूर्ण है, अन्यथा वह केवल सजावट का साधन बनकर रह जाती है। प्रथम वर्ष की छात्रा अवंतिका ने बताया कि इस मंच ने उन्हें अपनी बात रखने का आत्मविश्वास प्रदान किया।

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