अमेरिका और ईरान के बीच तनाव ने अब वह स्तर छू लिया है जहां कूटनीति की परत के नीचे सीधा सैन्य टकराव उबल रहा है। पेंटागन द्वारा लगभग दो हजार सैनिकों को तत्काल प्रभाव से मध्य पूर्व की ओर रवाना करने का आदेश इस बात का स्पष्ट संकेत है कि हालात नियंत्रण से बाहर जाने की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। हम आपको बता दें कि ये सैनिक अमेरिकी सेना की 82वीं एयरबोर्न डिवीजन की उस त्वरित प्रतिक्रिया टुकड़ी का हिस्सा हैं, जिसे दुनिया में कहीं भी अठारह घंटे के भीतर उतारा जा सकता है। इस टुकड़ी में डिवीजन के कमांडर मेजर जनरल ब्रैंडन टेग्टमेयर सहित उच्च स्तर का सैन्य ढांचा शामिल है। इसके साथ ही लगभग चार हजार पांच सौ मरीन पहले ही क्षेत्र की ओर बढ़ चुके हैं। यानी अब तक करीब सात हजार अतिरिक्त जमीनी सैनिक युद्ध क्षेत्र के आसपास पहुंचाए जा चुके हैं।
देखा जाये तो यह रणनीतिक दबाव का खुला प्रदर्शन है। कुल मिलाकर लगभग पचास हजार सैनिक इस व्यापक सैन्य अभियान का हिस्सा हैं, जिसे एपिक फ्यूरी नाम दिया गया है। यह अभियान मध्य पूर्व, यूरोप और अमेरिका तक फैला हुआ है, जो इस संघर्ष की वैश्विक गंभीरता को दर्शाता है। सबसे बड़ा सवाल है कि इन सैनिकों को आखिर कहां तैनात किया जाएगा? हालांकि आधिकारिक रूप से स्थान स्पष्ट नहीं किया गया है, लेकिन संकेत साफ हैं कि इन्हें ईरान के बेहद करीब उतारा जाएगा। खार्ग द्वीप, जो ईरान का प्रमुख तेल निर्यात केंद्र है, इस रणनीति का केंद्र बन सकता है। इस द्वीप पर पहले ही अमेरिकी हवाई हमलों में नब्बे से अधिक सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जा चुका है।
यदि खार्ग द्वीप पर कब्जा होता है, तो यह केवल एक सैन्य जीत नहीं बल्कि ईरान की आर्थिक रीढ़ पर सीधा प्रहार होगा। यही कारण है कि मरीन टुकड़ियों को इस द्वीप पर कब्जा करने या फिर होर्मुज जलडमरूमध्य को सुरक्षित करने के लिए तैयार रखा गया है। यह जलमार्ग विश्व की ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है, जिसे ईरान ने लगभग बंद कर दिया है।
रणनीतिक दृष्टि से देखें तो अमेरिका का यह कदम दोहरा दबाव बनाने की कोशिश है। एक ओर वह ईरान को सैन्य रूप से घेर रहा है, दूसरी ओर कूटनीतिक पहल की बात कर रहा है। यह वही पुरानी रणनीति है जिसमें ताकत दिखाकर बातचीत की मेज पर झुकाने की कोशिश की जाती है।
लेकिन ईरान भी चुप बैठने वाला नहीं है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने अमेरिका और इजराइल को साफ चेतावनी दी है कि अगर जमीनी हमला हुआ तो उसका जवाब ऐसा होगा जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ईरान ने अपने बयान में साफ कहा है कि हमलावर सैनिक ईरानी जनता के समुद्र में डूब जाएंगे।
ईरान का दावा है कि उसने इजराइल में अब तक सत्तर से अधिक स्थानों पर सटीक मिसाइल हमले किए हैं, जिनमें हाइफा, दिमोना और तेल अवीव के आसपास के इलाके शामिल हैं। इतना ही नहीं, सात सौ से अधिक मिसाइल और तीन हजार छह सौ ड्रोन हमले भी किए जा चुके हैं। यह आंकड़ा ईरान की जवाबी रणनीति की आक्रामकता को दर्शाता है।
इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व बेहद गहरा है। यदि अमेरिका खार्ग द्वीप या होर्मुज जलमार्ग पर नियंत्रण स्थापित करता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पूरी तरह उसके प्रभाव में आ सकती है। इससे न केवल ईरान बल्कि चीन और अन्य ऊर्जा निर्भर देशों पर भी सीधा दबाव पड़ेगा।
दूसरी ओर, यदि ईरान इस हमले का प्रभावी जवाब देता है, तो यह संघर्ष क्षेत्रीय युद्ध से निकलकर वैश्विक टकराव का रूप ले सकता है। इस स्थिति में पश्चिम एशिया एक बार फिर आग के उस दायरे में फंस जाएगा जिसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ेगा।
सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक निहितार्थ यह है कि यह टकराव केवल दो देशों के बीच नहीं रह गया है। इसमें इजराइल, खाड़ी देश, यूरोपीय शक्तियां और एशियाई अर्थव्यवस्थाएं भी अप्रत्यक्ष रूप से शामिल हो चुकी हैं। यानि यह एक बहुस्तरीय संघर्ष बन चुका है जिसमें हर कदम वैश्विक संतुलन को प्रभावित कर रहा है।
बहरहाल, यह स्पष्ट है कि यह युद्ध केवल बंदूकों और मिसाइलों का नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन और वैश्विक वर्चस्व की लड़ाई है। अमेरिका अपनी सैन्य ताकत से दबाव बना रहा है, जबकि ईरान अपनी आक्रामक जवाबी क्षमता से चुनौती दे रहा है। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह टकराव सीमित रहेगा या फिर दुनिया को एक और बड़े युद्ध की ओर धकेल देगा।

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