निजी स्कूलों की मनमानी के चलते अभिभावकों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। सबसे ज्यादा परेशानी हर साल बदले जा रहे सिलेबस और महंगी किताबों को लेकर सामने आ रही है। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन जानबूझकर हर वर्ष सिलेबस बदल देता है, जिससे पुरानी किताबें बेकार हो जाती हैं और नई किताबें खरीदने की मजबूरी बनती है।
अभिभावक नमन अग्रवाल का कहना है कि उनकी बेटी सेंट फ्रांसिस स्कूल में पढ़ती है, जहां हर साल सिलेबस बदल दिया जाता है। इस बार उन्हें करीब 5 हजार रुपये की किताबें खरीदनी पड़ीं, जो अगले साल किसी काम की नहीं रहेंगी। वहीं अभिभावक पूनम अरोड़ा ने बताया कि उनकी बेटी कक्षा 7 में पढ़ती है और उन्हें किताबों का 8500 रुपये का बिल थमा दिया गया। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे इतनी महंगी किताबें खरीदने में असमर्थ हैं। उनका यह भी आरोप है कि पहले कभी इतनी तेजी से सिलेबस पूरा कराने का दबाव नहीं था, लेकिन अब शिकायतों के बाद बच्चों पर जल्दी कोर्स खत्म करने का दबाव बनाया जा रहा है।
अभिभावकों का यह भी कहना है कि किताबों के साथ-साथ महंगी यूनिफॉर्म और जूते खरीदने का दबाव भी बनाया जाता है। स्कूलों द्वारा तय दुकानों से ही खरीदारी करनी पड़ती है, जहां बाजार से अधिक कीमत वसूली जा रही है। यूनिफॉर्म में मामूली बदलाव कर हर साल नया खरीदने को मजबूर किया जाता है।
मामले में पापा संस्था का कहना है कि हाल ही में सेंट पैट्रिक्स स्कूल पर लगाया गया जुर्माना सही कदम है और उनकी पहल पर ही यह कार्रवाई हुई है, लेकिन सिर्फ जुर्माना लगाना पर्याप्त नहीं है। संस्था का कहना है कि महंगी किताबों और यूनिफॉर्म बदलने की व्यवस्था को पूरी तरह बंद किया जाना चाहिए। उनका आरोप है कि यह खेल लगभग हर स्कूल में चल रहा है, जो शासनादेश के खिलाफ है।

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