केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के लखनऊ परिसर में बुधवार से सात दिवसीय ‘विशिष्ट व्याख्यानमाला’ का आगाज हो गया हैं । कार्यक्रम के पहले दिन ‘वेदों में पर्यावरणीय चेतना’ विषय पर आचार्यों ने विचार मंथन किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से आए मुख्य वक्ता प्रो. उपेन्द्र कुमार त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि पोषण सिखाया गया है। कार्यक्रम की शुरुआत लौकिक और वैदिक मंगलाचरण के साथ हुई, जिससे पूरा परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भर गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. धर्मेंद्र कुमार पाठक ने किया, जबकि डॉ. प्रणव कश्यप ने सभी अतिथियों का स्वागत कर व्याख्यानमाला की रूपरेखा सामने रखी। वेदों के मंत्रों में पर्यावरण संरक्षण के सूत्र मुख्य वक्ता प्रो. त्रिपाठी ने विस्तार से बताया कि वेदों के मंत्रों में पर्यावरण संरक्षण के सूत्र छिपे हैं। उन्होंने कहा कि आज जब दुनिया क्लाइमेट चेंज से जूझ रही है, तब वेदों की ‘पृथ्वी सूक्त’ जैसी ऋचाएं हमें रास्ता दिखाती हैं। अध्यक्षीय उद्बोधन: परिसर निदेशक प्रो. सर्वनारायण झा ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि वेदों में प्रकृति को पूजनीय माना गया है। जल, वायु और पृथ्वी का संतुलन बनाए रखना कोई उपकार नहीं, बल्कि मानव का अनिवार्य कर्तव्य है।प्रो. झा ने छात्रों से आह्वान किया कि वे प्राचीन ज्ञान को आधुनिक जीवनशैली में उतारें ताकि सतत विकास का लक्ष्य हासिल हो सके। ये रहे उपस्थित इस बौद्धिक समागम में प्रो. पवन कुमार, प्रो. गजाला अंसारी, प्रो. हरिनारायणधर द्विवेदी, डॉ. नीरज तिवारी, डॉ. कालिका प्रसाद शुक्ल, डॉ. रुद्र नारायण नरसिंह मिश्र और डॉ. अतुल कुमार श्रीवास्तव समेत कई वरिष्ठ प्राध्यापक और शोध छात्र मौजूद रहे। कार्यक्रम के अंत में डॉ. राहुल मिश्र ने सभी का आभार व्यक्त किया।

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