सहारनपुर में राष्ट्रीय शिक्षक महासंघ उत्तर प्रदेश के एक प्रतिनिधिमंडल ने रविवार को सांसद इमरान मसूद से मुलाकात की। संगठन ने शिक्षकों के हितों से जुड़ा एक विस्तृत मांगपत्र सौंपा, जिसमें अनुभवी शिक्षकों को शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता से छूट देने की प्रमुख मांग रखी गई। प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संगठन के प्रदेश अध्यक्ष चौधरी रविंद्र पवार और संगठन मंत्री वैभव चौहान ने किया। उन्होंने सांसद को अवगत कराया कि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा 1 सितंबर 2025 को पारित आदेश के अनुसार, प्रदेश के सभी शिक्षकों के लिए टीईटी अनिवार्य कर दी गई है। इससे हजारों अनुभवी शिक्षक असमंजस की स्थिति में आ गए हैं। नई नियुक्तियों की गुणवत्ता संगठन ने यह भी जानकारी दी कि देश के 29 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में पहले से कार्यरत अनुभवी शिक्षकों को उनके अनुभव, सेवाओं और कार्यकुशलता के आधार पर टीईटी से छूट दी गई है। इसके विपरीत, उत्तर प्रदेश में वर्ष 1988 के शासनादेश के तहत नियुक्त अनेक शिक्षक तीन दशक से अधिक समय से शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं, फिर भी उन्हें टीईटी को अनिवार्यता के दायरे में लाना अन्यायपूर्ण है। प्रतिनिधिमंडल ने सांसद के समक्ष दो प्रमुख मांगें रखीं। पहली, वर्ष 2010 से पूर्व नियुक्त सभी शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से पूरी तरह मुक्त किया जाए। दूसरी, वर्ष 2010 के बाद नियुक्त शिक्षकों के लिए पहले से लागू टीईटी की व्यवस्था को यथावत रखा जाए, ताकि नई नियुक्तियों की गुणवत्ता बनी रहे। सांसद इमरान मसूद ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से सुना। उन्होंने आश्वासन दिया कि शिक्षकों के हितों से जुड़े इस मुद्दे को वह संसद और शासन स्तर पर प्रभावी ढंग से उठाएंगे। सांसद ने कहा कि प्रदेश के अनुभवी शिक्षकों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए और इस दिशा में हर संभव प्रयास किए जाएंगे। संगठन पदाधिकारियों ने सांसद का आभार जताते हुए उम्मीद व्यक्त की कि उत्तर प्रदेश के शिक्षकों को भी शीघ्र ही अन्य राज्यों की भांति उचित राहत मिलेगी और शिक्षा व्यवस्था में स्थिरता बनी रहेगी।
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