म्यांमार से जिंदा लौटकर आ गया, वरना मरने पर लाश भी घरवालों को नहीं मिलती
“म्यांमार से जिंदा लौटकर आ गया, वरना मरने के बाद मेरी लाश भी घरवालों को नहीं मिलती। अब तो विदेश जाने के नाम से ही डर लगने लगा है। थाईलैंड में डाटा एंट्री ऑपरेटर की नौकरी के नाम पर वहां के दलालों ने म्यांमार के म्यवाडी स्थित केके पार्क पहुंचा दिया। वह पार्क नहीं, यातनागृह था। जो लोग अब भी वहां फंसे हैं, वे हर दिन अपनी मौत को बुलाते हैं। ऑनलाइन जॉब सर्च कर किसी के भरोसे देश से बाहर नहीं जाएं। विदेश जाने से पहले हर मोर्चे पर पूरी तरह जांच कर लें, नहीं तो साइबर फ्रॉड के चक्कर में फंस सकते हैं। भारत सरकार ने मुझे घरवालों से मिलवाया, इसके लिए शुक्रिया।” यह कहना है हाल ही में म्यांमार से लौटे गोराडीह प्रखंड के माछीपुर के मो. तनवीर आलम का। घर पहुंचने के 6 दिन बाद भास्कर टीम से अपना दर्द साझा करते हुए मो. तनवीर ने बताया कि 2012-17 तक सऊदी अरब में रहे। वहां डाटा एंट्री ऑपरेटर का काम करते थे। संतान नहीं होने पर 2017 में घर वापस आ गया। 2020 तक परिवार के साथ रहा और इलाज करवाया। फिर दुबई गया। 6 माह रहने के बाद वापस घर आ गया। इस बीच पहली पत्नी की सहमति से दूसरी शादी 2022 में की। मो. तनवीर आलम ने घर पहुंचने के 6 दिन के बाद भास्कर टीम से मिला रूह कंपाने वाली यातनाएं काम के दौरान झपकी लेने पर मिलती थी सजा: एक साल इसी तरह बीत गए, घर से बात करने के लिए 40 मिनट तय था। वीडियो नहीं ऑडियो कॉल करते थे, उस वक्त भी सुरक्षा में वे लोग रहते थे, ताकि कोई अंदर की बात न बता दे। 70 हजार रुपए सैलरी देता था, लेकिन सारे पैसे वहीं खत्म हो जाते थे। 16-16 घंटे काम करते थे। काम के दौरान झपकी लेने पर झपकी लेने पर 300 थाई बाट काट लिया जाता था, सजा भी मिलती थी। सेना ने कब्जे में लिया: हम लोगों ने भारतीय एंबेसी में शिकायत की। सेना आई और अपने कब्जे में ले लिया। 18 नवंबर को बॉर्डर ले जाया गया, वहां भारतीय एंबेसी ने चेक किया और मैसूर एयरपोर्ट ले जाया गया। वहां से फ्लाइट से पोर्ट ब्लेयर लाया गया और गाजियाबाद में लाकर छोड़ा गया।
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