DniNews.Live

बेलन घाटी में 55 हजार साल पुराने आग के सबूत:मानव इतिहास की समझ बदली, प्रोफेसर दीपक बोले- 10 किलोमीटर में हुआ शोध…अभी भी जारी है

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित बेलन नदी घाटी से एक ऐसी वैज्ञानिक खोज सामने आई है, जिसने मानव इतिहास और विकास को लेकर बनी धारणाओं को नया रूप दे दिया है। IISER Kolkata के वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार भारत में मानव द्वारा आग के नियंत्रित उपयोग के प्रमाण अब लगभग 50-55 हजार वर्ष पुराने हैं। इससे पहले यह समय सीमा केवल 18 हजार से 20 हजार वर्ष मानी जाती थी। प्रोफेसर दीपक ने बताया कि 2016 से अभी तक यह शोध लगातार जारी है। यह चर्चा काशी हिंदू विश्वविद्यालय में एंथ्रोपोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एंएसआई) के संयुक्त तत्वावधान में चल रही राष्ट्रीय संगोष्ठी में हुआ। क्या है पूरी खोज? वैज्ञानिकों ने बेलन घाटी के छह प्रमुख पुरातात्विक स्थलों—देवघाट, कोल्दिहवा, महागड़ा, चिल्लहिया, चोपानी-मांडो और मुख्य बेलन क्षेत्र—से प्राप्त मैक्रोचारकोल (बड़े कोयले के टुकड़े) का अध्ययन किया। इन नमूनों की उम्र करीब 50 हजार वर्ष पाई गई, जो इस बात का संकेत है कि उस समय के मानव आग का उपयोग कर रहे थे। कैसे साबित हुआ कि आग इंसानों ने जलाई? प्रोफेसर दीपक ने बताया हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि यह कोयला प्राकृतिक जंगल की आग से बना या मानव द्वारा। इसके लिए वैज्ञानिकों ने कई स्तरों पर जांच की जिसमें माइक्रोस्कोप में कोयले की संरचना सुरक्षित मिली, जिससे साफ हुआ कि यह बहकर नहीं आया और घाटी का ढाल कम और जलग्रहण क्षेत्र छोटा है, इसलिए दूर से आने की संभावना कम दिखी। उस समय भारी वर्षा और घने जंगल थे—ऐसी स्थिति में प्राकृतिक आग की संभावना बहुत कम होती है। इन सभी तथ्यों के आधार पर वैज्ञानिकों ने निष्कर्ष निकाला कि यह मानव द्वारा जलाई गई आग थी। मानव विकास से क्या जुड़ाव? प्रोफेसर दीपक कुमार झा के अनुसार, यह वही समय था जब मानव की सोचने-समझने की क्षमता तेजी से विकसित हो रही थी और नए-नए औजार बन रहे थे। आग का उपयोग मानव जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आया— भोजन पकाना शुरू हुआ,ठंड से बचाव संभव हुआ,जंगली जानवरों से सुरक्षा मिली,सामाजिक जीवन बेहतर हुआ। अब जानिए क्लाइमेट और जीवनशैली का संबंध शोध में केवल आग ही नहीं, बल्कि उस समय के पर्यावरण और जलवायु को भी समझने की कोशिश की गई। वैज्ञानिकों ने बताया कि किस प्रकार के पेड़-पौधे मौजूद थे। लोग किस तरह की लकड़ी या घास जलाते थे। उस समय का माइक्रो-क्लाइमेट कैसा था। इससे यह समझने में मदद मिली कि उस समय के लोग अपने आसपास के संसाधनों का कैसे उपयोग करते थे। चारकोल रिकॉर्ड से मिला बड़ा संकेत अध्ययन में पाया गया कि लोअर पैलियोलिथिक काल में चारकोल के कोई प्रमाण नहीं मिले। लगभग 55,000 साल पहले अचानक चारकोल की मात्रा बढ़ी। इसके बाद लगातार चारकोल के प्रमाण मिलते रहे। इससे यह संकेत मिलता है कि इसी समय से आग का नियमित उपयोग शुरू हुआ। प्राचीन डीएनए अनुसंधान में बहु-संस्थागत सहयोग समय की मांग प्रो. शर्मा ने कहा कि 1945 से चल रहे एंएसआई के कार्यों ने देश में जैविक मानवशास्त्र की दिशा तय की है। उन्होंने जोर दिया कि अब समय आ गया है जब बहु-संस्थागत सहयोग न केवल फायदेमंद बल्कि अत्यंत आवश्यक हो गया है। उन्होंने मल्टी-इंस्टीट्यूशनल सहयोग को भविष्य की जरूरत बताया। इसके बाद सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (सीडीएफडी) के निदेशक प्रो. उल्लास कोलथुर-सीताराम ने भी इस कार्य में सहयोग के सवाल पर कहा कि वे जैविक मानवशास्त्र के इस मिशन में पूरी तरह शामिल होने को तैयार हैं। भारत में नमूना संरक्षण चुनौती पर जोर प्रो. थंगराज ने आगे कहा कि प्राचीन डीएनए सिर्फ अतीत नहीं, बल्कि बीमारियों, आहार संबंधी आदतों और सदियों पुरानी म्यूटेशन्स का खजाना है। उन्होंने जोर दिया कि इन सवालों के जवाब के लिए भारत को और अधिक आधुनिक प्रयोगशालाओं की तुरंत जरूरत है। पैनल चर्चा में तकनीकी, नैतिक और बुनियादी ढांचागत चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा हुई और सभी विशेषज्ञों ने मिलकर भारत में प्राचीन डीएनए अनुसंधान को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए ठोस रोडमैप बनाने पर सहमति जताई। बीएचयू-एंएसआई की यह संयुक्त संगोष्ठी ‘फाउंडेशन टू फ्रंटियर्स’ यात्रा को और मजबूत बनाने वाली साबित हो रही है।

Source: Dainik Bhaskar via DNI News (Prayagraj)

Puri Khabar Yahan Padhein…

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *