उत्तर प्रदेश के पीलीभीत निवासी शिक्षक रमाकांत शर्मा का बीते शुक्रवार निधन हो गया। डिजिटल युग में जहाँ लोग डाक टिकटों को लगभग भूल चुके हैं, वहीं रमाकांत जी ने अपनी पूरी जिंदगी इन्हीं टिकटों को सहेजने में समर्पित कर दी थी। वे अपने पीछे 80,000 डाक टिकटों का एक विशाल और अनूठा संग्रह छोड़ गए हैं, जो भविष्य की पीढ़ियों को इतिहास की झलक दिखाता रहेगा। रमाकांत शर्मा का यह सफर बचपन में एक शौक के रूप में शुरू हुआ था, जो अगले 60 वर्षों तक अटूट चलता रहा। उनके संग्रह में आजादी से पूर्व के दुर्लभ टिकटों से लेकर दुनिया के कोने-कोने के विदेशी डाक टिकट शामिल हैं। उनके घर की अलमारियां किसी संग्रहालय से कम नहीं लगती थीं, जहाँ हर एल्बम राजनीति, कला और समाज के बदलते स्वरूप का एक जीवंत दस्तावेज प्रस्तुत करता है। 6 तस्वीरें देखिए… बाजार के जानकारों के अनुसार, इस संग्रह की कीमत 5 लाख रुपये से भी अधिक आंकी गई है। हालांकि, रमाकांत जी के लिए ये केवल कागज के टुकड़े या निवेश नहीं थे; उन्होंने अपनी जमापूंजी का एक बड़ा हिस्सा इन टिकटों को जुटाने में खर्च किया था। उनके कलेक्शन में अत्यंत दुर्लभ टिकट, विश्वव्यापी संकलन और व्यवस्थित वर्गीकरण जैसी मुख्य विशेषताएं शामिल हैं, जिससे छात्र आसानी से शोध कर सकते हैं। रमाकांत जी का मानना था कि एक छोटा सा डाक टिकट पूरी दुनिया को एक धागे में पिरोने की ताकत रखता है। वे अक्सर कहते थे कि इंटरनेट और मोबाइल में खोई आज की पीढ़ी को इन टिकटों के जरिए इतिहास को समझना चाहिए। उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनके इस खजाने को किसी ऐसी जगह सहेजा जाए, जहाँ छात्र और इतिहास प्रेमी इससे प्रेरणा ले सकें। भले ही आज रमाकांत शर्मा हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन पीलीभीत के इस ‘टिकट मैन’ का 60 साल का कठिन परिश्रम और उनका ‘मिनी म्यूजियम’ हमेशा उनकी यादों को जीवंत रखेगा।

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