लखनऊ के गोमती नगर स्थित डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में आयोजित दो दिवसीय ‘श्रीराम जन्मोत्सव 5.0’ का रविवार को भव्य समापन हुआ। कार्यक्रम में मेडिकल छात्र-छात्राओं ने भगवान श्रीराम के जीवन और रामायण के प्रसंगों पर आधारित विचार प्रस्तुत किए, वहीं भजन, नृत्य और नृत्य-नाटिका के माध्यम से अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न विषयों पर शोध पत्र भी प्रस्तुत किए गए। मंच पर हुई सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में श्रीराम के आदर्शों और जीवन मूल्यों को जीवंत रूप में दर्शाया गया, जो दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। चिकित्सा अधीक्षक प्रो. विक्रम सिंह ने कहा कि हर व्यक्ति की जिम्मेदारी ही उसका सच्चा धर्म है। डॉक्टरों को समाज में भगवान का रूप माना जाता है, इसलिए उन्हें हर मरीज को स्वस्थ रखने का संकल्प लेना चाहिए। यह प्रेरणा रामचरितमानस से मिलती है। संस्थान के निदेशक प्रो. सीएम सिंह ने कहा कि मेडिकल संस्थान में भगवान राम पर चर्चा इसलिए जरूरी है, क्योंकि वे जीवन जीने की कला सिखाते हैं। राम केवल आस्था के प्रतीक नहीं, बल्कि सत्य और मर्यादा के आदर्श हैं, जिनके मार्ग पर चलकर समाज और राष्ट्र की प्रगति संभव है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अवध प्रांत प्रचारक कौशल ने कहा कि जीवन के विवाद, द्वेष और अंतर्कलह का समाधान भगवान राम के जीवन से मिलता है। उन्होंने कहा कि राम हमें सिखाते हैं कि माता-पिता, गुरु, मित्र, पत्नी और यहां तक कि शत्रु के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास की चौपाई “परहित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई” का उल्लेख करते हुए परोपकार को सर्वोच्च धर्म बताया। साथ ही निषादराज और शबरी प्रसंग का जिक्र कर सामाजिक समरसता का संदेश दिया और कहा कि जब भगवान राम ने सभी को अपनाया, तो समाज में ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं होना चाहिए।

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